
सिलवटो की सिहरन
अक्सर तेरा साया;
एक अनजानी धुंध से चुपचाप चला आता ...है
और मेरी मन की चादर में सिलवटे बना जाता है …॥
मेरे हाथ ,
मेरे दिल की तरह कांपते है ,
जब मैं उन सिलवटों को अपने भीतर समेटती हूँ …॥
तेरा साया मुस्कराता है ;
और मुझे उस जगह छु जाता है
जहाँ तुमने कई बार पहले मुझे छुआ था ....
मैं सिहर सिहर जाती हूँ ,
कोई अजनबी बनकर तुम आते हो
और मेरी खामोशी को आग लगा जाते हो …
कोई अजनबी बनकर तुम आते हो
और मेरी खामोशी को आग लगा जाते हो …
तेरे जिस्म का एहसास ...
मेरे चादरों में धीमे धीमे उतरता है ....
मैं चादरें तो धो लेती हूँ ;
पर मन को कैसे धो लूँ ....
कई जनम जी लेती हूँ तुझे भुलाने में ,
पर तेरी मुस्कराहट ,
जाने कैसे बहती चली आती है ,
न जाने, मुझ पर कैसी बेहोशी सी बिछा जाती है …॥
कोई पीर पैगम्बर मुझे तेरा पता बता दे ,
कोई माझी ,तेरे किनारे मुझे ले जाए ,
कोई देवता तुझे फिर मेरी मोहब्बत बना दे.......
या तो तू यहाँ आजा ,या मुझे वहां बुला ले......
मैंने अपने घर के दरवाजे खुले रख छोडे है ........